तरसती है मिट्टी by Shobha Sundharam

तरसती है मिट्टी

By Shobha Sundharam

मिट्टी से खेलते थे कभी बच्चे
तितलियो का पीछा करती थी बचपन
पिठू,चोर सिपाही मे बीतती थी इनकी शाम
मोहल्ला चहक जाता था उनके खुशहाल तरन्नुम से
शाम ढलते ही
रात अपना चादर ओढ़ने से पहले
मां बाबा का बुलावा आ जाता था
सभी बच्चे अपने घरों में
दूसरे दिन की आस लगाए
रात के चादर में
मीठे सपने लिए
थक के पर खुशी समेट कर सो जाते थे
और अब
है नहीं मिट्टी से उनका रिशता
ये महज़ किताबों के
भूगोल विषय से जुड़ी तस्वीरों में सहम गई
चार दीवारों में बीतता है बचपन
टीवी, कम्प्यूटर,या मोबाइल
के पीछे है कैद
गुमनाम हैं वह मोहल्ला
भयानक आकार के इमारतों ने किया है उसे गिरफ्त
जहां बचपन, जवानी और बुढ़ापा
एक संग वास करते हैं
सभी है एक ही कार्य में लीन
वैज्ञानिक उपकरणों ने कर लिया है
इन सब को अपने अधीन
अब कौन बच्चा,
कौन जवान
और कौन बूढ़ा
स्थिर जल की तरह
ठहर गई
बचपन, जवानी और बुढ़ापा
और यहां मिट्टी तरसती है
अपने बच्चों और उनके बचपन को

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